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तीन डीजी की तैयारी, 84 पदों का हिसाब… नियमों की माला में कहां फिट होगी कल्लूरी-गुप्ता-सिन्हा की ‘तिकड़ी’?

Preparations for three DGs

– कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा को डीजी स्तर पर पदोन्नति की संभावित कवायद से छत्तीसगढ़ पुलिस में हलचल
– केंद्र की अधिसूचना में 84 वरिष्ठ ड्यूटी पद, डीजी के दो पद दर्ज—तीन नामों के बाद सबसे बड़ा सवाल पदोन्नति नहीं, समायोजन का

रायपुर. छत्तीसगढ़ पुलिस के शीर्ष गलियारों में इन दिनों तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं—एसआरपी कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा। तीनों फिलहाल एडीजी स्तर के अधिकारी हैं और इन्हें डीजी स्तर पर पदोन्नत किए जाने की संभावित कवायद ने पुलिस मुख्यालय से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि तीनों को डीजी बनाया जाएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि अगर तीनों डीजी स्तर पर पहुंचते हैं तो कैडर के मौजूदा ढांचे में उनकी भूमिका, पद और जिम्मेदारी का रास्ता क्या होगा?

क्या कहता है नियम
…और यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। केंद्र सरकार की 21 मई 2025 की आधिकारिक अधिसूचना छत्तीसगढ़ आईपीएस कैडर का जो नया ढांचा सामने रखती है, उसमें राज्य सरकार के अधीन 84 वरिष्ठ ड्यूटी पद निर्धारित हैं। इसी सूची में पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ का एक पद और पुलिस महानिदेशक, प्रशिक्षण एवं राज्य पुलिस अकादमी का एक पद दर्ज है।

यानी सरकारी दस्तावेज एक तरफ है और तीन अधिकारियों की संभावित डीजी पदोन्नति की चर्चा दूसरी तरफ। इन दोनों को साथ रखकर देखने पर सवाल अपने आप खड़ा होता है— तीन नाम डीजी स्तर पर पहुंचते हैं तो प्रशासनिक समीकरण किस तरह बनेगा?

तीन नाम… और यहीं से शुरू होती है असली कहानी
कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा के नामों को लेकर चल रही चर्चा को महज सामान्य पदोन्नति प्रक्रिया मानकर छोड़ देना आसान होगा, लेकिन आईपीएस कैडर में डीजी स्तर तक पहुंचना वरिष्ठता, उपलब्ध पदों, कैडर संरचना और पदस्थापना के कई स्तरों से जुड़ा मामला है। इसलिए तीन अधिकारियों के नाम एक साथ सामने आना अपने आप में महत्वपूर्ण है। पदोन्नति यदि होती है तो उसके बाद तीनों की जिम्मेदारियां क्या होंगी, किसे कौन सा विभाग मिलेगा और क्या मौजूदा कैडर संरचना में ही इसका रास्ता निकलेगा—ये सवाल आने वाले प्रशासनिक फैसलों के साथ स्पष्ट होंगे।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि आधिकारिक अधिसूचना में तीन नए डीजी पद सृजित होने की बात नहीं है। दस्तावेज सिर्फ कैडर की स्वीकृत संरचना बताता है। इसलिए तीन अधिकारियों की संभावित पदोन्नति को सीधे तीन नए पदों के सृजन के रूप में पढऩा सही नहीं होगा। असली सवाल यही है कि पदोन्नति के बाद **समायोजन किस प्रशासनिक व्यवस्था से होगा।

84 वरिष्ठ पदों में डीजी का दोहरा ठिकाना
21 मई 2025 को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने भारतीय पुलिस सेवा के कैडर की संख्या में संशोधन से जुड़ी अधिसूचना जारी की। इसमें छत्तीसगढ़ के लिए वरिष्ठ ड्यूटी पदों की संख्या 84 रखी गई है।
इसके बाद सूची में डीजी पुलिस, छत्तीसगढ़ का एक पद और डीजी प्रशिक्षण एवं राज्य पुलिस अकादमी का एक पद दर्ज है। इसके नीचे एडीजी स्तर के विभिन्न पद भी सूचीबद्ध हैं—इंटेलिजेंस, प्रशासन एवं चयन, वित्त एवं योजना, सीएएफ, जेल एवं सुधारात्मक सेवाएं, सीआईडी/एजेके/सतर्कता तथा संचालन/एसआईबी/एसटीएफ आदि।
यानी कैडर की आधिकारिक सूची यह बताती है कि वरिष्ठ स्तर पर पदों का पूरा ढांचा पहले से निर्धारित है। अब तीन अधिकारियों की संभावित पदोन्नति की चर्चा इस ढांचे के भीतर नया प्रशासनिक सवाल पैदा करती है।

तीन डीजी की चर्चा में ‘तीसरे नाम’ का सवाल क्यों अहम?
यहां एक बारीक फर्क समझना जरूरी है। डीजी स्तर पर पदोन्नति और डीजी के किसी खास सूचीबद्ध पद पर पदस्थापना एक ही चीज नहीं है। किसी अधिकारी को डीजी स्तर का वेतनमान या पदोन्नति मिलना और उसे किसी विशिष्ट डीजी पद पर नियुक्त किया जाना प्रशासनिक रूप से अलग-अलग प्रश्न हो सकते हैं। इसलिए यदि तीनों अधिकारियों को डीजी स्तर पर पदोन्नत किया जाता है, तो यह जरूरी नहीं कि तीनों को उसी क्षण तीन अलग-अलग ‘डीजी पुलिस’ पदों पर बैठाया जाए।
लेकिन तब अगला सवाल और बड़ा हो जाता है—तीसरे अधिकारी को किस जिम्मेदारी के साथ डीजी स्तर पर रखा जाएगा? यही वह बिंदु है जहां इस पूरी कवायद की असली तस्वीर सरकारी आदेश सामने आने के बाद साफ होगी।

153 की ताकत 142 से कितना बढ़ा कैडर?
अधिसूचना में दर्ज सरकारी आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ आईपीएस कैडर की कुल अधिकृत संख्या अब 153 है। अधिसूचना से पहले यह संख्या 142 थी। यानी कैडर की कुल अधिकृत संख्या में 11 पदों की वृद्धि हुई है।
लेकिन इस 153 की संख्या को सीधे डीजी पदों की संख्या समझना भी गलत होगा। इसमें वरिष्ठ ड्यूटी पद, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व, राज्य प्रतिनियुक्ति रिजर्व, प्रशिक्षण रिजर्व, अवकाश एवं कनिष्ठ रिजर्व तथा पदोन्नति और सीधी भर्ती से जुड़े पद शामिल हैं।
अधिसूचना में वरिष्ठ ड्यूटी पदों की संख्या 84, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व अधिकतम 33, राज्य प्रतिनियुक्ति रिजर्व 21, प्रशिक्षण रिजर्व 2 और अवकाश एवं कनिष्ठ रिजर्व 13 दर्ज है। पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने वाले पदों की अधिकतम संख्या 46 तथा सीधी भर्ती के पद 107 निर्धारित किए गए हैं। यानी कैडर का गणित बड़ा है, लेकिन डीजी की कुर्सियों का सवाल इस पूरे गणित के भीतर एक अलग अध्याय है।

पदोन्नति के 46 पद और डीजी की तीन चर्चित फाइलें
अधिसूचना के मुताबिक भारतीय पुलिस सेवा भर्ती नियम, 1954 के नियम 9 के तहत पदोन्नति से भरे जाने वाले पदों की अधिकतम संख्या 46 है। इस आंकड़े का अर्थ यह नहीं है कि 46 पद डीजी स्तर के हैं। यह पूरे कैडर की पदोन्नति व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए तीन अधिकारियों की डीजी स्तर की संभावित पदोन्नति का विश्लेषण करते समय 46 की संख्या को डीजी पदों की संख्या से जोडऩा तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन यही आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि आईपीएस कैडर में पदोन्नति की व्यवस्था एक निर्धारित संरचना के भीतर चलती है। इसलिए तीन वरिष्ठ अधिकारियों की संभावित पदोन्नति के बाद उनकी पदस्थापना और जिम्मेदारियों का निर्धारण प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण होगा।

नीचे पदोन्नति का इंतजार, ऊपर डीजी की चर्चा
यहीं इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है। पुलिस विभाग के निचले स्तर पर लंबे समय से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों और पुलिस मुख्यालय के कर्मचारियों के बीच भी यह सवाल उठता रहा है कि पदोन्नति की प्रक्रिया में समान गति और प्राथमिकता क्यों नहीं दिखाई देती।
आपके मूल इनपुट के मुताबिक पुलिस मुख्यालय के कर्मचारियों में भी लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार है और 2013 के बाद भर्ती नहीं होने की स्थिति का उल्लेख किया गया है। ऐसे में जब शीर्ष स्तर पर तीन अधिकारियों की संभावित पदोन्नति की खबर सामने आती है तो स्वाभाविक रूप से नीचे के कर्मचारियों के बीच तुलना शुरू होती है।
सवाल यह नहीं कि आईपीएस को पदोन्नति क्यों मिल रही है। सवाल यह है कि अलग-अलग संवर्गों में पदोन्नति की गति, पदों की उपलब्धता और नियमों का अनुपालन किस तरह सुनिश्चित किया जा रहा है। यही सवाल इस खबर को सिर्फ तीन अधिकारियों की पदोन्नति से आगे ले जाता है।

2018 का पन्ना फिर क्यों पलटा जा रहा है?

तीन डीजी की मौजूदा चर्चा के बीच 2018 का घटनाक्रम भी याद किया जा रहा है। उस दौर में तीन एक्स-कैडर डीजी स्तर के पदों को लेकर विवाद और केंद्र की सहमति का सवाल उठा था। संजय पिल्लै, आर.के. विज और मुकेश गुप्ता को डीजी स्तर पर पदोन्नति दिए जाने के बाद पदों की वैधता और केंद्र की सहमति का मामला सामने आया और बाद में घटनाक्रम न्यायिक विवाद तक पहुंचा।
यही वजह है कि आज जब फिर तीन नाम एक साथ डीजी स्तर की चर्चा में हैं तो पुराने घटनाक्रम का संदर्भ अपने आप सामने आ रहा है।
महकमे में लोग मजे लेकर कह रहे हैं कि तीन का अंक शायद डीजी प्रमोशन में फिर लौट आया है, बस इस बार फाइल को पिछली कहानी वाला मोड़ नहीं लेना चाहिए। यह तुलना हालांकि सीधे तौर पर मौजूदा मामले की वैधानिक स्थिति तय नहीं करती। वर्तमान मामले में लागू नियम, स्वीकृत पद और अंतिम सरकारी आदेश ही निर्णायक होंगे।

तीन नामों के पीछे असली खेल वरिष्ठता का?
डीजी स्तर की पदोन्नति का असर केवल उस दिन की पदस्थापना तक सीमित नहीं रहता। वरिष्ठता क्रम आगे की कई प्रशासनिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

यही कारण है कि पुलिस महकमे में चर्चा करने वाले लोग इसे केवल तीन अधिकारियों की पदोन्नति नहीं मान रहे। सवाल यह भी है कि आज डीजी स्तर पर पहुंचने वाला कौन अधिकारी कल प्रदेश पुलिस की सबसे महत्वपूर्ण कुर्सियों की कतार में कहां खड़ा होगा?
वरिष्ठता, पदस्थापना, विभागीय अनुभव और उपलब्ध पद—ये सभी भविष्य के समीकरण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए आज की पदोन्नति को कल के नेतृत्व-समीकरण से अलग करके देखना आसान नहीं है।

अरुण देव गौतम, हिमांशु गुप्ता और जीपी सिंह का पुराना पन्ना
मूल चर्चा में पिछली डीजी पदोन्नति के दौरान अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता के साथ जीपी सिंह के नाम को लेकर भी संदर्भ दिया गया है। उस समय सूची में शामिल न होना और बाद में समय के साथ डीजी स्तर तक पहुंचना यह बताता है कि आईपीएस की वरिष्ठता और पदोन्नति की तस्वीर हमेशा एक ही समय पर पूरी नहीं होती।
यही वजह है कि वर्तमान तीन नामों की चर्चा को भी केवल आज की सूची के रूप में नहीं देखा जा रहा। आईपीएस कैडर में कौन आज किस स्तर पर है और कल किस स्तर पर होगा, दोनों सवाल अलग हैं।

नियमों की माला….लेकिन माला में गांठ कहां है?
पूरी कहानी का सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही है। नियम मौजूद हैं। कैडर की अधिसूचना मौजूद है। पदों की संख्या दर्ज है। पदोन्नति का गणित दर्ज है। लेकिन जैसे ही तीन वरिष्ठ अधिकारियों की संभावित डीजी पदोन्नति की चर्चा सामने आती है, सवाल उठने लगते हैं कि इस पूरी संरचना में तीनों की अंतिम जगह क्या होगी।
नीचे का कर्मचारी जब पदोन्नति मांगता है तो सेवा अवधि, रिक्ति, वरिष्ठता, विभागीय प्रक्रिया और नियमों की पूरी किताब सामने रख दी जाती है। ऊपर जब बड़े पद की बात होती है तो वही किताब किस तरह पढ़ी जाती है—यही असली सवाल है।
हालांकि यहां भी तुलना करते समय यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग संवर्गों की पदोन्नति के नियम और पद संरचना अलग हो सकती है। इसलिए सवाल उठाना अलग बात है और यह निष्कर्ष निकाल देना कि नियम सिर्फ नीचे वालों पर लागू होते हैं, अलग।

तीन डीजी… तीन नाम… और कल की कुर्सी का सवाल
कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा के नाम इस समय चर्चा के केंद्र में हैं। यदि तीनों डीजी स्तर पर पदोन्नत होते हैं तो उसके बाद होने वाली पदस्थापनाएं, जिम्मेदारियों का वितरण और वरिष्ठता क्रम ही बताएगा कि इस कवायद का वास्तविक प्रशासनिक अर्थ क्या है।
सरकारी अधिसूचना फिलहाल इतना स्पष्ट करती है कि छत्तीसगढ़ कैडर में 84 वरिष्ठ ड्यूटी पद हैं, डीजी पुलिस का एक और डीजी प्रशिक्षण एवं राज्य पुलिस अकादमी का एक पद सूचीबद्ध है तथा कुल अधिकृत कैडर संख्या 153 है।
इसलिए अभी सबसे सटीक सवाल यही है कि तीन अधिकारियों की डीजी स्तर पर संभावित पदोन्नति के बाद व्यवस्था किस रूप में सामने आएगी? क्योंकि कहानी सिर्फ आज की तीन कुर्सियों की नहीं है।
आज की फाइल में लिखी जाने वाली वरिष्ठता, कल की कतार तय कर सकती है। और जहां तीन नाम एक साथ डीजी की सीढ़ी चढऩे की तैयारी में हों, वहां पुलिस महकमे की नजर सिर्फ सीढ़ी पर नहीं होती—नजर उस कुर्सी पर भी होती है, जो सीढ़ी के सबसे ऊपर है। तालाब सरकारी है, नियम किताब में हैं, तीन नाम चर्चा में हैंज् अब देखना यह है कि पानी किस दिशा में बहता है।

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