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राष्ट्रपति भवन के 620 पौधों का भी रिकॉर्ड, पतंजलि ने संरक्षित किए 27 हजार से ज्यादा पादप नमूने।

भारत की वनस्पति विरासत के संरक्षण और पादप अनुसंधान के क्षेत्र में पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन (पीआरएफ) लगातार काम कर रहा है। फाउंडेशन के वैज्ञानिकों ने अब तक 27 हजार से अधिक पादप नमूनों को पतंजलि पादपालय (हरबेरियम) में संरक्षित किया है। वहीं, देश के विभिन्न राज्यों में सर्वेक्षण के दौरान 100 से अधिक नए पादप अभिलेख दर्ज किए गए हैं।

आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में पीआरएफ की ओर से उत्तराखंड समेत हरियाणा, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में पादप सर्वेक्षण किया गया है। राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में भी पहली बार 620 से अधिक पौधों का रिकॉर्ड तैयार किया गया। इसके आधार पर ‘फ्लोरा ऑफ प्रेसिडेंट हाउस’ और ‘मेडिसिनल प्लांट्स ऑफ प्रेसिडेंट हाउस’ पुस्तकें तैयार की गईं। दो नवंबर 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इन पुस्तकों का विमोचन किया था। दिल्ली के पादपों की चेकलिस्ट भी प्रकाशित की गई।

पीआरएफ के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2024 में कैम्पेन्यूला डेन्सीसिलिएटा के रूप में नई पादप प्रजाति दर्ज की। इसके अलावा विभिन्न राज्यों से प्राप्त कई अन्य पादप प्रजातियों की पहचान और वैज्ञानिक अध्ययन का काम भी जारी है। फाउंडेशन के अनुसार, दर्ज किए गए नए पादप अभिलेखों को क्यू बोटानिकल गार्डेन के डिजिटल डाटाबेस और ऑनलाइन पोर्टल में भी स्थान मिला है।

नमामि गंगे परियोजना के तहत वर्ष 2023-24 में गोमुख से गंगासागर तक गंगा के दोनों किनारों पर पादप सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान कई पादपों को संबंधित राज्यों के वनस्पति अभिलेख में शामिल किया गया। उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों में किए गए सर्वेक्षण में स्थानीय समुदायों की ओर से उपयोग किए जाने वाले पादपों को भी दर्ज किया गया।

हरियाणा के मोरनी हिल्स और अरुणाचल प्रदेश के पाके-कसांग जिले के सिजोसा क्षेत्र में भी सर्वेक्षण किया गया। वहीं, हरिद्वार जिले का पादप सर्वेक्षण वर्तमान में जारी है। ‘फ्लोरा ऑफ हरिद्वार’ तैयार करने के दौरान कई पादपों को उत्तराखंड के वनस्पति अभिलेख में दर्ज किया गया है।

आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि नई पादप प्रजातियों और अभिलेखों की खोज केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जैव विविधता संरक्षण, औषधीय पौधों की पहचान और भविष्य के वानस्पतिक अनुसंधान के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे भारत की प्राकृतिक विरासत का वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार करने में मदद मिल रही है।

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